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ध्यान बिंदु उपनिषद : योग उपनिषद

ध्यान बिंदु उपनिषद

NTA UGC NET JRF Yoga Paper 2: Unit 3 योग उपनिषद

परिचय 

यह उपनिषद् कृष्णयजुर्वेदीय परम्परा से सम्बद्ध है। इस उपनिषद् के नाम ही स्पष्ट है कि इसका
केन्द्रीय भाव ‘ध्यान’ है। इस उपनिषद् का शुभारम्भ ही ‘ब्रह्म ध्यानयोग’ से किया गया है। तत्पश्चात् क्रमश:
ब्रह्म की सूक्ष्मता एवं सर्वव्यापकता, प्रणव (ओंकार) का स्वरूप, प्रणव के ध्यान की विधि, प्राणायाम के साथ
प्रणव का ध्यान, सविशेष ब्रह्म का ध्यान, हृदय में ध्यान एवं उसका प्रतिफल, षडंगयोग, आसन चतुष्टय (सिद्ध,
भद्र, सिंह और पद्म), मूलाधार आदि चार चक्र, नाड़ी चक्र, दस प्राण, जीव का प्राण-अपान का वशवर्ती
होना, योग के समय प्राण और अपान की एकता, अजपा हंस विद्या, कुण्डलिनी से मोक्ष प्राप्ति, ब्रह्मचर्यादि से
कुण्डलिनी जागरण, तीनों बन्ध, खेचरी मुद्रा, खेचरी से वज्रोली सिद्धि, महामुद्रा, हृदय में आत्मानुभव तथा
नादानुसन्धान द्वारा आत्मदर्शन आदि विषय वर्णित हैं । साधना द्वारा सिद्धि प्राप्त करने के इच्छुक साधकों के लिए
इस उपनिषद् में बड़ा ही व्यावहारिक मार्गदर्शन उपलब्ध है।
॥शान्तिपाठः॥
……….. इति शान्तिः॥(द्रष्टव्य-अक्ष्युपनिषद्)

ध्यान योग का महत्व


यदि शैलसमं पापं विस्तीर्णं बहुयोजनम्।

भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो भेदः कदाचन ॥१॥
यदि पर्वत की तरह (अनेक जन्मों के सञ्चित) अनेक योजन व्यापकत्व लिए पाप समूह हों, तो भी ध्यान योग साधना द्वारा उनको नष्ट किया जाना सम्भव है, अन्य किसी साधन से उनका नाश सम्भव नहीं ॥१॥
बीजाक्षरं परं बिन्दुं नादं तस्योपरि स्थितम्।

सशब्दं चाक्षरे क्षीणे निःशब्दं परमं पदम्॥२॥
बीजाक्षर (ॐकार) से परे बिन्दु स्थित है और उसके ऊपर नाद विद्यमान है, जिसमें मनोहर शब्द-ध्वनि सुनाई पड़ती है। उस नादध्वनि के अक्षर में विलय हो जाने पर जो शब्द विहीन स्थिति होती है, वही ‘परमपद‘के नाम से जानी गयी है ॥२॥

अनाहतं तु यच्छब्दं तस्य शब्दस्य यत्परम्।

तत्परं विन्दते यस्तु स योगी छिन्नसंशयः॥३॥
अर्थ: –  उस अनाहत शब्द (मेघ गर्जना की तरह प्रकृति का आदि शब्द) का जो परम कारण तत्त्व है, उससे भी परे परम कारण (निर्विशेष ब्रह्म) स्वरूप को जो योगी प्राप्त कर लेता है, उसके सब संशय नष्ट हो जाते हैं ॥ ३ ॥

ब्रह्म की सत्ता का वर्णन

वालाग्रशतसाहस्रं तस्य भागस्य भागिनः।

तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरञ्जनम्॥४॥

अर्थ – यदि बाल (गेहूँ आदि की बाल) के अग्रभाग अर्थात् नोक के एक लाख हिस्से किये जाएँ, (तो उसका एक सूक्ष्म भाग जीव कहलाएगा), उसके पुनः उतने भाग अर्थात् एक लाख भाग किये जाएँ (इन सूक्ष्मतर भागों को ईश्वर कहा जायेगा)। तत्पश्चात् उस (एक लाखवें) हिस्से के भी पचास हजार हिस्से किये जाने पर जो शेष रहे, उसके भी (साक्ष्य-साक्षी आदि विशेषण के भी) क्षय हो जाने पर जो सूक्ष्म से भी अतिसूक्ष्म शेष रहे, वह उस निरञ्जन (विशुद्ध) ब्रह्म की सत्ता है॥ ४ ॥

पुष्पमध्ये यथा गन्धः पयोमध्ये यथा घृतम्।

तिलमध्ये यथा तैलं पाषाणेष्विव काञ्चनम्॥५॥

एवं सर्वाणि भूतानि मणौ सूत्र इवात्मनि।

स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥६॥

 अर्थ – जिस प्रकार पुष्प में गन्ध, दूध में घृत, तिल में तेल तथा सोने की खान के पाषाणों में सोना प्रत्यक्ष रूप
से न दिखने पर भी अव्यक्त रूप से विद्यमान रहता है, उसी प्रकार आत्मा का अस्तित्व सभी प्राणियों में निहित
है। स्थिर बुद्धि से सम्पन्न मोहरहित ब्रह्मवेत्ता मणियों में पिरोये गये सूत्र की तरह आत्मा के व्यापकत्व को
जानकर उसी ब्रह्म में स्थित रहते हैं ।। ५-६ ॥

आत्मा की सत्ता का वर्णन


तिलानां तु यथा तैलं पुष्पे गन्ध इवाश्रितः।

पुरुषस्य शरीरे तु स बाह्याभ्यन्तरे स्थितः॥७॥
अर्थ – जिस प्रकार तिलों में तेल और पुष्पों में गन्ध आश्रित है, उसी प्रकार पुरुष के शरीर के भीतर और बाहर
आत्मतत्त्व विद्यमान है॥७॥

वृक्षंतु सकलं विद्याच्छाया तस्यैव निष्कला।

सकले निष्कले भावे सर्वत्रात्मा व्यवस्थितः॥८॥
अर्थ – जिस प्रकार वृक्ष अपनी सम्पूर्ण कला के साथ स्थित रहता है और उसकी छाया कलाहीन (निष्कल) होकर रहती है। उसी प्रकार आत्मा कलात्मक स्वरूप और निष्कल (छाया स्थानीय मायारूप) भाव से सभी जगह विद्यमान है॥८॥

ओम कार रूप ब्रह्म का वर्णन


ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ध्येयं सर्वमुमुक्षुभिः। पृथिव्यग्निश्च ऋग्वेदो भूरित्येव पितामहः॥ ९॥
अकारे तु लयं प्राप्ते प्रथमे प्रणवांशके। अन्तरिक्षं यजुर्वायुर्भुवो विष्णुर्जनार्दनः ॥१०॥
उकारे तु लयं प्राप्ते द्वितीये प्रणवांशके। द्यौः सूर्यः सामवेदश्च स्वरित्येव महेश्वरः॥ ११॥
मकारे तु लयं प्राप्ते तृतीये प्रणवांशके। अकारः पीतवर्णः स्याद्रजोगुण उदीरितः॥१२॥
उकारः सात्त्विकः शुक्लो मकारः कृष्णतामसः ।अष्टाङ्गं च चतुष्पादं त्रिस्थानं पञ्चदैवतम्॥१३॥

अर्थ – ॐ कार रूपी एकाक्षर ब्रह्म ही सभी मुमुक्षुओं का लक्ष्य रहा है । प्रणव के पहले अंश ‘अकार’ में पृथ्वी,
अग्नि, ऋग्वेद, भूः तथा पितामह ब्रह्मा का लय होता है। दूसरे अन्तरिक्ष, यजुर्वेद, वायु, भुवः
तथा जनार्दन विष्णु का लय होता है । तृतीय अंश ‘मकार’ में द्यौ, सूर्य, सामवेद, स्वः तथा महेश्वर का लय होता
है। अकार’ पीतवर्ण और रजोगुण से युक्त है, उकार’ श्वेत वर्ण और सात्त्विक गुण वाला तथा ‘मकार’ कृष्णवर्ण
एवं तमोगुण से युक्त है। इस प्रकार ॐकार आठ अङ्ग, चार पैर, तीन नेत्र और पाँच दैवत से युक्त है ॥९-१३॥
[ यहाँ ॐ कार के आठ अंग’ का अभिप्राय- अकार, उकार, मकार, नाद, बिन्दु, कला, कलातीत तथा उससे
भी परे से है। ‘चतुष्पाद’ का अभिप्राय- व्यष्टिपरक-विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय तथा समष्टिपरक-विराट्, सूत्र, बीज
और तुर्य से है। ‘त्रिस्थान’ का तात्पर्य-जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति; स्थूल, सूक्ष्म, कारणशरीर; सत, रज, तम गुण; ज्ञान,
इच्छा, क्रिया शक्ति अथवा भूत, वर्तमान, भविष्यत् काल से है। पंचदेवता का अभिप्राय-ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और
सदाशिव से है।] 

ओंकार ध्यान से मोक्ष प्राप्ति

ओंकारं यो न जानाति ब्राह्मणो न भवेत्तु सः। प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्मतल्लक्ष्यमुच्यते॥१४॥
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्। निवर्तन्ते क्रियाः सर्वास्तस्मिन्दृष्टे परावरे॥१५॥
अर्थ -जो   व्यक्ति ॐकार (प्रणव) से अनभिज्ञ है, उसे ब्राह्मण नहीं कहा जा सकता। प्रणव को धनुष, आत्मा
को बाण और ब्रह्म को ही लक्ष्य कहा जाता है। बिना प्रमाद किये तन्मयतापूर्वक बाण से लक्ष्य का वेधन करना
चाहिए। (इसके परिणाम स्वरूप) परावर अर्थात् ब्रह्म के सायुज्यत्व को प्राप्त कर लेने पर सभी क्रियाओं से
निवृत्ति (मोक्ष की प्राप्ति) होती है ॥१४-१५॥
 

ओंकारप्रभवा देवा ओंकारप्रभवाः स्वराः। 

ओंकारप्रभवं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥१६॥

ॐ कार से देवों की उत्पत्ति, ॐकार से स्वर की उत्पत्ति और ॐ कार से ही त्रिलोक के सभी स्थावर-

जंगम की उत्पत्ति हुई है ॥ १६ ॥

ह्रस्वो दहति पापानि दीर्घः संपत्प्रदोऽव्ययः। अर्धमात्रासमायुक्तः प्रणवो मोक्षदायकः॥१७॥

ॐ का ह्रस्व अंश पापों का दहन करता है, दीर्घ अंश अमृतत्वरूप अक्षय सम्पदा को प्रदान करता है तथा

अर्द्धमात्रा से युक्त प्रणव मोक्षदायक है ॥ १७ ॥

तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत्। 

अवाच्यं प्रणवस्याग्रं यस्तं वेद स वेदवित्॥१८॥

तेल की अजस्र धारा की तरह, घण्टा के लम्बे निनाद के समान प्रणव के आगे ध्वनिरहित शब्द होता है,

उसका ज्ञाता ही वेदवेत्ता है ॥ १८ ॥

हृत्पद्मकर्णिकामध्ये स्थिरदीपनिभाकृतिम् । अङ्गुष्ठमात्रमचलं ध्यायेदोंकारमीश्वरम्॥१९॥

हृदयकमल की कर्णिका के मध्य स्थिर ज्योतिशिखा के समान अंगुष्ठमात्र आकार के नित्य ॐकार रूप परमात्मा का ध्यान करे॥१९॥

इडया वायुमापूर्य पूरयित्वोदरस्थितम्। 

ओंकारं देहमध्यस्थं ध्यायेज्ज्वालावलीवृतम्॥२०॥

ब्रह्मा पूरक इत्युक्तो विष्णुः कुम्भक उच्यते।

रेचो रुद्र इति प्रोक्तः प्राणायामस्य देवताः॥२१॥

इड़ा (बायीं नासिका) से वायु को भरकर उदर में स्थापित करे और देह के बीच में ज्योतिर्मय ॐ कार

का ध्यान करे। पूरक, कुम्भक और रेचक को क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र कहा गया है, ये प्राणायाम के देवता

कहलाते हैं ॥ २०-२१ ।।

[ यहाँ यह ध्यातव्य है कि आगे चलकर २९ से ३१ मन्त्र में पूरक के समय ‘विष्णु’, कुम्भक के समय ‘ब्रह्मा’

एवं रेचक के समय ‘शिव’ का ध्यान करना लिखा है। यही पुरातन परम्परा भी है, परन्तु इस मन्त्र में पूरक को ‘ब्रह्मा’

और कुम्भक को ‘विष्णु’ कहा जाना परम्परा से हटकर है, जो विचारणीय है।]

आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्। ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्येन्निगूढवत्॥२२॥

अन्तःकरण और प्रणवाक्षर को नीचे और ऊपर की अरणिरूप बनाकर मंथनरूप ध्यान के अभ्यास से

अग्नि की भाँति व्याप्त गूढतत्त्व (परमात्मा) का साक्षात्कार करे॥२२॥

ओंकारध्वनिनादेन वायोः संहरणान्तिकम्।

 यावद्बलं समादध्यात्सम्यङ्नादलयावधि ॥२३॥

प्रणव ध्वनि का, नाद सहित रेचक वायु के विलय हो जाने तक अपनी सामर्थ्यानुसार (तब तक) ध्यान करे, जब तक नाद का भली प्रकार लय नहीं हो जाता ॥ २३ ॥

गमागमस्थं गमनादिशून्यमोंकारमेकं रविकोटिदीप्तम्।

पश्यन्ति ये सर्वजनान्तरस्थं हंसात्मकं ते विरजा भवन्ति ॥२४॥

गमन और आगमन में विद्यमान तथा गमनादि से रहित, करोड़ों सूर्यों की प्रभा के समान सभी मनुष्यों के

अन्त:करण में विराजमान हंसात्मक प्रणव का जो दर्शन करते हैं, वे कृतकृत्य हो जाते हैं ॥ २४ ॥

यन्मनस्त्रिजगत्सृष्टिस्थितिव्यसनकर्मकृत्। 

तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम्॥२५॥

अष्टपत्रं तु हृत्पद्मं द्वात्रिंशत्केसरान्वितम्। 

तस्य मध्ये स्थितो भानुर्भानुमध्यगतः शशी ॥२६॥

जो मन त्रिगुणमय संसार के सृजन, पालन और संहार का कारण है, उसके विलय हो जाने पर विष्णु के

परमपद की प्राप्ति होती है। अष्टदल और बत्तीस पंखुड़ियों से युक्त जो हृदयकमल है, उसके बीच सूर्य और सूर्य

के बीच चन्द्रमा विद्यमान है ॥२५-२६ ॥

शशिमध्यगतो वह्निर्वह्निमध्यगता प्रभा । 

प्रभामध्यगतं पीठं नानारत्नप्रवेष्टितम् ॥२७॥

तस्य मध्यगतं देवं वासुदेवं निरञ्जनम्। श्रीवत्सकौस्तुभोरस्कं मुक्तामणिविभूषितम्॥२८॥

`

चन्द्रमा के बीच अग्नि और अग्नि के बीच दीप्ति स्थित है। उसके बीच नानाविध रत्नों से सुसज्जित

पीठस्थान है। उस पीठ के बीच निरञ्जन प्रभु वासुदेव विराजमान हैं, जो श्रीवत्स, कौस्तुभमणि एवं मणि-

मुक्ताओं से विशेष रूप से सुशोभित हैं ।। २७-२८॥

शुद्धस्फटिकसंकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम्। एवं ध्यायेन्महाविष्णुमेवं वा विनयान्वितः॥२९॥

शुद्ध स्फटिक के सदृश करोड़ों चन्द्रमा की कान्ति वाले महाविष्णु का विनयान्वित होकर ध्यान करे॥२९

अतसीपुष्पसंकाशं नाभिस्थाने प्रतिष्ठितम्। 

चतुर्भुजं महाविष्णुं पूरकेण विचिन्तयेत्॥३०॥

पूरक द्वारा साँस अन्दर खींचते समय नाभिस्थान में प्रतिष्ठित अतसी पुष्प के समान चतुर्भुज महाविष्णु

भगवान् का ध्यान करना चाहिए ॥ ३०॥

कुम्भकेन हृदि स्थाने चिन्तयेत्कमलासनम्। 

ब्रह्माणं रक्तगौराभं चतुर्वक्त्रं पितामहम्॥३१॥

कुम्भक द्वारा साँस भीतर रोकने के समय हृदय स्थल में कमल के आसन पर सुशोभित लालिमामय गौर

वर्ण वाले चतुर्मुख पितामह ब्रह्मा का ध्यान करना चाहिए ॥ ३१ ॥

रेचकेन तु विद्यात्मा ललाटस्थं त्रिलोचनम्।

शुद्धस्फटिकसंकाशं निष्कलं पापनाशनम्॥३२॥

रेचक से साँस छोड़ते हुए ललाट में शुद्ध स्फटिक के सदृश श्वेत रंग के त्रिनेत्रयुक्त, निष्कल(कलारहित),

पाप संहारक भगवान् शिव का ध्यान करना चाहिए ॥ ३२॥

अब्जपत्रमधः पुष्पमूर्ध्वनालमधोमुखम् । 

कदलीपुष्पसंकाशं सर्ववेदमयं शिवम् ॥३३॥

नीचे की ओर पुष्पित हुआ, ऊपर की ओर नाल वाला तथा अधोभाग की ओर मुख किये हुए कदली

पुष्प की तरह हृदयकमल में सभी वेदों के आधारभूत भगवान् शिव अवस्थित हैं ।। ३३ ॥

शतारं शतपत्राढ्यं विकीर्णाम्बुजकर्णिकम्। तत्रार्कचन्द्रवह्नीनामुपर्युपरि चिन्तयेत्॥ ३४॥

सौ अरे वाले, सौ पत्ते वाले और विकसित पंखुड़ियों से युक्त हृदय पद्म में सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि का

एक के बाद दूसरे का क्रमशः ध्यान करना चाहिए ॥ ३४ ॥

पद्मस्योद्घाटनं कृत्वा बोधचन्द्राग्निसूर्यकम्।

 तस्य हृद्वीजमाहृत्य आत्मानं चरते ध्रुवम्॥३५॥

सूर्य, चन्द्र और अग्नि के बोध हेतु सर्वप्रथम हृदयकमल के विकसित होने का ध्यान करे। तत्पश्चात् हृदय

कमल में स्थित बीजाक्षरों को ग्रहण करके ही अचल चेतनावस्था की प्राप्ति होती है ॥ ३५ ॥

त्रिस्थानं च त्रिमार्गं च त्रिब्रह्म च त्रयाक्षरम्।

 त्रिमात्रमर्धमात्रं वा यस्तं वेद स वेदवित्॥३६॥

तीन स्थान, तीन मार्ग, त्रिविध ब्रह्म, त्रयाक्षर, त्रिमात्रा तथा अर्द्धमात्रा में जो परमात्मा स्थित है, उसके

ज्ञाता ही वेद के तात्पर्य के ज्ञाता हैं ॥ ३६॥

[ यहाँ कुछ सांकेतिक शब्द प्रयुक्त हैं, जिनका तात्पर्य इस प्रकार है- त्रिस्थान-अवस्थात्रय-जाग्रत, स्वप्न,

सुषुप्ति; त्रिमार्ग-धूम, अर्चि, अगति; ब्रह्मत्रय-विश्व, विराट्, ओतृब्रह्म; याक्षर-अ, उ, म्; त्रिमात्रा-हस्व,दीर्घ, प्लुत।]

तैलधारामिवाच्छिन्नदीर्घघण्टानिनादवत्। 

बिन्दुनादकलातीतं यस्तं वेद स वेदवित्॥ ३७॥

दीर्घ घण्टा निनाद के सदृश, तेल की अविच्छिन्न धारा की तरह तथा बिन्दु-नाद और कला से अतीत उस

परम तत्त्व (ॐकार) को जो जानता है, वही वेदज्ञ है ॥ ३७॥

यथैवोत्पलनालेन तोयमाकर्षयेन्नरः ।

 तथैवोत्कर्षयेद्वायुं योगी योगपथे स्थितः ॥३८॥

जिस प्रकार मनुष्य कमलनाल से जल को धीरे-धीरे खींचते हैं, उसी प्रकार योगी योगस्थ होकर प्राणायाम द्वारा वायु को धीरे-धीरे ऊर्ध्व भूमिका में ले जाए ॥ ३८॥

अर्धमात्रात्मकं कृत्वा कोशभूतं तु पङ्कजम्। कर्षयेन्नालमात्रेण भ्रुवोर्मध्ये लयं नयेत्॥३९॥

प्रणव की अर्द्धमात्रा (अव्यक्त नाद उच्चारण) को रस्सी बनाकर हृदयकमल रूपी कूप नाल (सुषुम्ना)

मार्ग द्वारा जलरूपा कुण्डलिनी को भौंहों के मध्य में लय करे॥ ३९ ॥

भ्रुवोर्मध्ये ललाटे तु नासिकायास्तु मूलतः।

 जानीयादमृतं स्थानं तद्ब्रह्मायतनं महत्॥४०॥

नासिका के मूल से लेकर भौंहों के बीच में जो ललाट स्थान है, वहाँ तक अमृत स्थान जानना चाहिए, वही ब्रह्म का महान् निवास स्थान है ॥ ४०॥

षडंग योग का वर्णन

आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा। 

ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट्॥४१॥

आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि-ये छ: योग के अङ्ग कहे गये हैं ॥४१॥

आसनानि च तावन्ति यावन्त्यो जीवजातयः। एतेषामतुलान्भेदान्विजानाति महेश्वरः॥४२॥

विश्व में जितनी जीव प्रजातियाँ हैं, उतनी ही आसनों की विधियाँ भी बतायी गई हैं, इस प्रकार के असंख्य भेदों के ज्ञाता भगवान् शंकर हैं ॥ ४२ ॥

सिद्धं भद्रं तथा सिंहं पद्मं चेति चतुष्टयम्।

आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम्॥४३॥

सिद्ध, भद्र, सिंह और पद्म ये चार प्रमुख आसन हैं, पहला चक्र आधार (मूलाधार) और दूसरा स्वाधिष्ठान है ॥४३॥

योनिस्थानं तयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते।

आधाराख्ये गुदस्थाने पङ्कजं यच्चतुर्दलम्॥४४॥

तन्मध्ये प्रोच्यते योनिःकामाख्या सिद्धवन्दिता।

योनिमध्ये स्थितं लिङ्गं पश्चिमाभिमुखं तथा॥४५

इन दोनों के बीच में कामरूप प्रजनन स्थान है । गुदा स्थान के आधारचक्र में चतुर्दल कमल विद्यमान है। उसके बीच काम नाम से प्रख्यात प्रजनन-योनि (कुण्डलिनी शक्ति) है, जिसकी अभ्यर्थना सिद्धजन करते हैं। प्रजनन योनि के बीच पश्चिम की ओर पुरुष जननेन्द्रिय लिङ्ग है ॥ ४४-४५ ॥

मस्तके मणिवद्भिन्नं यो जानाति स योगवित्।

तप्तचामीकराकारं तडिल्लेखेव विस्फुरत्॥४६॥

चतुरस्त्रमुपर्यग्नेरधो मेढ़ात्प्रतिष्ठितम् । 

स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयम्॥४७॥

मस्तक में मणि की तरह जो प्रकाश है, उसे जो जानता है वह योगवेत्ता है। तपे हुए सोने के समान वर्णवाला और तडित् की धारा की तरह विशेष प्रकाशित, अग्निमण्डल से चार अंगुल ऊपर और मेढ़ (मूत्रेन्द्रिय) से नीचे स्वसंज्ञक प्राण विद्यमान है, उसके आश्रय में स्वाधिष्ठान है ॥ ४६-४७ ॥

स्वाधिष्ठानं ततश्चक्रं मेढ़मेव निगद्यते ।

 मणिवत्तन्तुना यत्र वायुना पूरितं वपुः॥४८॥

तन्नाभिमण्डलं चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम्। 

द्वादशारमहाचक्रे पुण्यपापनियन्त्रितः ॥४९॥

उसके बाद स्थित स्वाधिष्ठान चक्र को मेढ़ ही कहा जाता है। जहाँ मणि के प्रकाश की तरह वायु से पूर्ण

शरीर है। नाभिमण्डल में स्थित चक्र को मणिपूरक कहा गया है। वहाँ बारह दल से युक्त महाचक्र में पुण्य और

पाप का नियन्त्रण रहता है ।।४८-४९ ॥

तावज्जीवो भ्रमत्येवं यावत्तत्त्वं न विन्दति।

ऊर्ध्वं मेढ़ादधो नाभेः कन्दो योऽस्ति खगाण्डवत्॥५०

तत्र नाड्यः समुत्पन्नाः सहस्राणि द्विसप्ततिः। 

तेषु नाडीसहस्त्रेषु द्विसप्ततिरुदाहृताः॥५१॥

इस तत्त्वज्ञान को न समझ पाने तक जीवात्मा को भ्रमजाल में ही फंसे रहना पड़ता है । मेढ़ स्थान से ऊपर

और नाभि से नीचे पक्षी के अण्डे की तरह कन्द का स्थान है। उसी स्थान से बहत्तर हजार नाड़ियाँ उत्पन्न होती

हैं,उन हजारों नाड़ियों में बहत्तर नाड़ियाँ प्रमुख हैं ॥ ५०-५१॥

प्रधानाः प्राणवाहिन्यो भूयस्तत्र दश स्मृताः। 

इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्ना च तृतीयका॥५२॥

गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी।

अलम्बुसा कुहूरत्र शङ्खिनी दशमी स्मृता ॥५३॥

इनमें से दस प्रमुख नाड़ियाँ प्राण का संचार करने वाली हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना, गान्धारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुसा, कुहू तथा शंखिनी ॥ ५२-५३ ॥

एवं नाडीमयं चक्रं विज्ञेयं योगिना सदा। 

सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः॥ ५४॥

इडापिङ्गलासुषुम्नास्तिस्रो नाड्यः प्रकीर्तिताः ।

 इडा वामे स्थिता भागे पिङ्गला दक्षिणे स्थिता॥५५

सुषुम्ना मध्यदेशे तु प्राणमार्गास्त्रयः स्मृताः।

 प्राणोऽपानः समानश्चोदानो व्यानस्तथैव च॥५६

नागः कूर्मः कृकरको देवदत्तो धनंजयः।

 प्राणाद्याः पञ्च विख्याता नागाद्याः पञ्च वायवः ॥५७॥

इस नाड़ी चक्र की जानकारी योग-साधकों को होना आवश्यक है। सतत प्राण का संचार करने वाली

इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि देवों से युक्त हैं । इड़ा नाड़ी बायीं ओर, पिङ्गला

दाहिनी ओर तथा सुषुम्ना इन दोनों के बीच विद्यमान है, ये तीनों नाड़ियाँ प्राण के संचरण-मार्ग-रूपा हैं। प्राण,

अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर,देवदत्त और धनञ्जय ये दस प्राण हैं, प्राणादि पाँच प्राण प्रख्यात

हैं तथा नागादि पाँच उपप्राण कहे गये हैं ॥५४-५७ ॥

एते नाडीसहस्त्रेषु वर्तन्ते जीवरूपिणः।

 प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं प्रधावति॥५८॥

इन हजारों नाड़ियों में प्राण जीवरूप से वास करते हैं। प्राण और अपान के वशीभूत होकर जीव ऊपर-

नीचे आवागमन करता रहता है ॥ ५८ ॥

वामदक्षिणमार्गेण चञ्चलत्वान्न दृश्यते। 

आक्षिप्तो भुजदण्डेन यथोच्चलति कन्दुकः॥५९॥

प्राणापानसमाक्षिप्तस्तद्वज्जीवो न विश्रमेत्।

अपानात्कर्षति प्राणोऽपानः प्राणाच्च कर्षति॥६०॥

खगरजुवदित्येतद्यो जानाति स योगवित्।

 हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः॥६१॥

हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा।

 शतानि षड् दिवारानं सहस्राण्येकविंशतिः॥६२॥

एतत्संख्यान्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा।

 अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदा सदा॥६३॥

प्राण कभी दायें तो कभी बायें मार्ग से गमन करता है, परन्तु चञ्चल प्रकृति का होने से देखने में नहीं

आता। हाथों से फेंकी हुई गेंद जैसे इधर-उधर दौड़ती है, उसी प्रकार प्राण और अपान द्वारा भली प्रकार फेंकने

से जीव को कभी आराम नहीं मिल पाता। अपान और प्राण की एक दूसरे को खींचने की प्रक्रिया उसी प्रकार

की है, जैसे रस्सी में आबद्ध पक्षी अपनी ओर खींच लिया जाता है। इस तत्त्व के ज्ञाता को ही योगी कहा जा

सकता है। ‘ह’ कार ध्वनि से प्राण बाहर जाता है और ‘स’ कार से पुनः अन्दर प्रवेश करता है। ‘हंस’ ‘हंस’

इस प्रकार का ‘मन्त्र जप’ जीव हमेशा जपता रहता है । इस अजपा-जप की संख्या दिन-रात में इक्कीस हजार छ:

सौ होती है। इतनी संख्या में मन्त्र जीव हमेशा जपता है । जो योगियों के लिए मोक्ष प्रदान करने वाली है, यही

अजपा गायत्री कहलाती है।॥ ५९-६३ ॥

अस्याः संकल्पमात्रेण नरः पापैः प्रमुच्यते।

अनया सदृशी विद्या अनया सदृशो जपः ॥६४॥

अनया सदृशं पुण्यं न भूतं न भविष्यति।

येन मार्गेण गन्तव्यं ब्रह्मस्थानं निरामयम्॥६५॥

इस (अजपा गायत्री) के संकल्प मात्र से व्यक्ति पापकर्मों से मुक्त हो जाता है । जिस मार्ग से योग साधक

सुगमता से ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। जिसके सदृश न कोई विद्या है, न जप है और न ही कोई पुण्य, जो पहले

न कभी हुआ है और न आगे कभी हो सकेगा॥ ६४-६५ ॥

मुखेनाच्छाद्य तद्द्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी। 

प्रबुद्धा वह्नियोगेन मनसा मरुता सह ॥६६॥

सूचिवद्गुणमादाय व्रजत्यूर्ध्वं सुषुम्नया। 

उद्घाटयेत्कपाटं तु यथा कुञ्चिकया हठात्॥६७॥

कुण्डलिन्या तया योगी मोक्षद्वारं विभेदयेत्॥६८॥

वह्रियोग द्वारा जाग्रत् होने वाली परमेश्वरी (कुण्डलिनी) उस द्वार-पथ को अपने मुंह से आच्छादित

करके प्रसुप्त स्थिति में है। वह जाग्रत् किये जाने पर सुषुम्ना मार्ग से मन और प्राण वायु के साथ ऊर्ध्वगमन करती है, जैसे सुई धागे को साथ ले जाती है। योगी मुक्ति द्वार को कुण्डलिनी शक्ति द्वारा उसी प्रकार उद्घाटित करते

हैं, जैसे ताली से प्रयासपूर्वक दरवाजे को खोल लिया जाता है॥६६-६८ ॥

कृत्वा संपुटितौ करौ दृढतरं बध्वाथ पद्मासनं गाढं वक्षसि सन्निधाय चुबुकं ध्यानं च तच्चेतसि।

वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोच्चारयन्पूरितं मुञ्चन्प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्तिप्रभावानरः॥६९॥

सुदृढ़ रूप में पद्मासन लगाकर, दोनों हाथों को सम्पुटित करके ठोड़ी से वक्षभाग (कण्ठकूप) को

दृढ़तापूर्वक दबाकर, चित्त में स्वरूप का ध्यान करते हुए बार-बार अपान वायु को ऊपर की ओर चलायमान

करता हुआ और अन्दर खींची हुई प्राण वायु को नीचे छोड़ता हुआ योग साधक अतुलित कुण्डलिनी शक्ति के

सामर्थ्य बोध. को प्राप्त करता है ।। ६९॥

पद्मासनस्थितो योगी नाडीद्वारेषु पूरयन्। 

मारुतं कुम्भयन्यस्तु स मुक्तो नात्र संशयः॥७॥

जो योगसाधक पद्मासन में बैठकर नाड़ीद्वार से प्राणवायु को खींचकर, कुम्भक द्वारा उसे रोकता है । वह

सुनिश्चित रूप से मोक्ष को प्राप्त करता है, इसमें संदेह की गुंजायश नहीं ॥ ७० ॥

अङ्गानां मर्दनं कृत्वा श्रमजातेन वारिणा। कट्वम्ललवणत्यागी क्षीरपानरतः सुखी॥७१॥

ब्रह्मचारी मिताहारी योगी योगपरायणः।

अब्दादूर्ध्वं भवेत्सिद्धो नात्र कार्या विचारणा॥७२॥

(प्राणायाम के) परिश्रम द्वारा जो स्वेदकण निकले, उन्हें अङ्गों में ही मल ले। कटु, अम्ल और नमक

का परित्याग करके दुग्ध का सेवन करने वाला सुखी रहता है। इस प्रकार योगस्थ होकर अल्प आहार करने

वाला ब्रह्मचारी योगी एक साल के अन्तराल में ही सिद्धि को प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं ॥७१-७२॥

कन्दोर्ध्वकुण्डली शक्तिः स योगी सिद्धिभाजनम्।

अपानप्राणयोरैक्यं क्षयान्मूत्रपुरीषयोः ॥७३॥

युवा भवति वृद्धोऽपि सततं मूलबन्धनात्।

पाणिभागेन संपीड्य योनिमाकुञ्चयेद्गुदम्॥७४॥

अपानमूर्ध्वमुत्कृष्य मूलबन्धोऽयमुच्यते।

उड्याणं कुरुते यस्मादविश्रान्तमहाखगः ॥७५॥

उड्डियाणं तदेव स्यात्तत्र बन्धो विधीयते।

उदरे पश्चिमं ताणं नाभेरूज़ तु कारयेत्॥७६ ॥

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